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प्रणाम उदन्त मार्त्तण्ड
हिंदी का पहला समाचार पत्र है– ‘उदन्त मार्त्तण्ड’
हिंदी पत्रकारिता का यह बीज सबसे पहले कोलकाता की ही भूमि पर पड़ा। 30 मार्च 1826 को इसका प्रकाशन आरंभ हुआ। इसके संपादक और संचालक युगलकिशोर शुक्ल थे। अंग्रेजों के समय कलकत्ता ही राजधानी थी और उत्तर भारत के लोक व्यापार-रोजगार की तलाश में कलकत्ता पहुँचते थे। युगलकिशोर शुक्ल भी अपने आरंभिक समय में कलकत्ता की सदर अदालत में क्लर्क थे। बाद में वे वकील बने।
‘उदन्त मार्त्तण्ड’ का प्रकाशन क्यों किया गया?
इसका एक तर्कपूर्ण उल्लेख पहले ही अंक में इन शब्दों में किया गया-“हिंदुस्तानियों के हित के हेतु…।” आम भारतीयों के हित में प्रकाशित ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ के हर अंक के अंत में यह भी लिखा होता था-“यह ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ कलकत्ते में कोल्हू टोला के अमड़ा तला की गली के 37 अंक की हवेली के मार्त्तण्ड छापा में हर सतवारे मंगलवार को शाया होता है। जिनको लेने का काम पड़े वे उस छापाघर में अपना नाम भेजने से ही उनके समीप भेजा जाएगा। मोल महीने में दो रुपया।”
उदन्त मार्त्तण्ड का आकार एवं भाषा
‘उदन्त मार्त्तण्ड’ का आकार 30×20 सेमी और पृष्ठ संख्या आठ थी। इसकी भाषा कलकत्ता में बोली जाने वाली हिंदी थी। इसके प्रकाशन की सूचना समाचार चंद्रिका में छपी, जिसके अनुसार-“अंग्रेजी और बांग्ला के पत्रों के बाद फारसी और ऊर्दू में भी पत्र प्रकाशित हुए और अब नागरी भाषा में उदन्त मार्त्तण्ड प्रकाशित हुआ है, जिससे हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है।”
समाचार दर्पण ने कहा
“हाल ही में इस कलकत्ता नगर से ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ नामक नागरी का नूतन समाचार पत्र प्रकाशित हुआ है, इससे हमारे आह्लाद की सीमा नहीं है, क्योंकि समाचार पत्र द्वारा संपत्ति संबंधी और नाना देशों के राज सम्पर्कीय वृत्तांत प्रकाशित होते हैं, जिनके जानने से अवश्य ही उपकार होता है।”
आवरण पृष्ठ यानी आज की भाषा में कवर पेज के ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ नाम छपा होता था, जिसके नीचे छोटे अक्षरों में अर्थात् और उसके नीचे संस्कृत का एक श्लोक छपता था। इसका अर्थ है-“सूर्य के प्रकाश के बिना जिस तरह अंधेरा नहीं मिटता उसी तरह समाचार सेवा के बिना अज्ञ जन जानकार नहीं बन सकते। इसलिए मैं यह प्रयत्न कर रहा हूँ।”
प्रसिद्ध संपादक नारायण दत्त ने लिखा
‘उदन्त मार्त्तण्ड’ का अर्थ समाचार-सूर्य है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि हिंदी पत्रकारिता के आदि पुरुष को पत्रकार के प्रथम कर्त्तव्य की बड़ी सही और स्पष्ट पहचान थी।
उस समय हिंदी में दो तरह की लेखन शैलियाँ प्रचलित थीं। बृजभाषा की शैली का परिचय स्वयं ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ में 11 दिसंबर 1827 के अंक में मिलता है। कलकत्ता की स्थानीय भाषा और संस्कृति का प्रभाव स्वाभाविक था। अपने समय की जनजागृति का प्रभाव भी हिंदी के इस पहले समाचार पत्र पर पड़ा।
अपने प्रकाशन के एक वर्ष सात माह बाद हिंदी पत्रकारिता का यह पहला दीया बुझ गया। सरकार, कारोबारी और पाठकों से किसी भी प्रकार की सहायता नहीं जुट पाने के कारण यह स्थिति बनी। तब अंग्रेज सरकार बांग्ला, ऊर्दू और फारसी के अखबारों को आर्थिक सहायता देती थी। मगर कलकत्ता के हिंदी भाषी पाठक दो रुपए महीने में ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ को लेने के लिए तैयार नहीं थे।
19 दिसंबर 1827 को 79वें अंक में युगलकिशोर शुक्ल की विवशता इन शब्दों में प्रकाशित हुई- “आज दिवस लौं उग चुक्यौ यह मार्त्तण्ड उदन्त। अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अंत।। (पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर की रचना ‘भारतीय पत्रकारिता कोश’ से।)
उद्देश्य
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भारत में हिंदी के पहले समाचार पत्र ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ को 200 वर्ष हो रहे हैं। यह भारतीय पत्रकारिता के लिए एक गौरवपूर्ण प्रसंग है। देश में मीडिया के सबसे बड़े विश्वविद्यालय होने के नाते माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय परिवार ने इस अवसर पर कोलकाता में दो दिवसीय ‘प्रणाम उदन्त मार्त्तण्ड’ के आयोजन का निश्चय किया है।
- विचार यह है कि विभिन्न राज्यों के शीर्ष समाचार पत्र-पत्रिकाओं के संपादक प्रतिनिधि इसमें उपस्थित हों और हिंदी पत्रकारिता की जन्मभूमि को प्रणाम करें। संयोग से ‘वंदे मातरम्’ के भी 150 वर्ष हुए हैं और स्वाधीनता के इस महामंत्र की उत्पत्ति भी कलकत्ता की ऊर्जावान भूमि पर हुई।
- हम सबके संज्ञान में है कि भारत की स्वाधीनता में समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने किस प्रकार अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और स्वाधीन भारत के निर्माण में अपनी भूमिका निभाई। यह एक अवसर है कि हम हिंदी पत्रकारिता के आदि पुरुष और ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ के संपादक युगलकिशोर शुक्ल के प्रति भी अपनी सामूहिक आदरांजलि प्रकट करें।
हिन्दी प़त्रकारिता पर लिखी गई पुस्तकें
1) श्री विजयदत्त श्रीधर
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समग्र भारतीय पत्रकारिताविजयदत्त श्रीधर
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2) श्री कृष्ण बिहारी मिश्र
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हिन्दी पत्रकारिताकृष्ण बिहारी मिश्र
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3) डॉ. बदरीनाथ कपूर
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हिन्दी पत्रकारिता की शब्दी संपदाडॉ. बदरीनाथ कपूर,
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4) श्री जवाहर कर्नावट
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विदेश में हिंदी पत्रकारिताजवाहर कर्नावट |
5) डॉ. वेदप्रताप वैदिक
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हिन्दी पत्रकारिता विविध आयाम(दो खंडों में)
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6) प्रो. शंभुनाथ
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हिन्दी पत्रकारिता हमारी विरासत(दो खंडों में)
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7) डॉ. अर्जुन तिवारी
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हिन्दी् पत्रकारिता का बृहद इतिहासडॉ. अर्जुन तिवारी
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8) डॉ. मंगला अनुजा
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आधी दुनिया की पूरी पत्रकारिताडॉ. मंगला अनुजा |
9) श्री आलोक मेहता
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पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखाआलोक मेहता
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10) श्री गिरीश पंकज
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पत्रकारिता के अमिट हस्ताक्षरगिरीश पंकज |
11) डॉ. रेखा शर्मा
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हिंदी पत्रकारिताडॉ. रेखा शर्मा
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12) डॉ अरुण कुमार भगत
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हिंदी की आधुनिक पत्रकारिताअरूण कुमार भगत
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13) श्री जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी
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हिन्दी पत्रकारिता का इतिहासजगदीश प्रसाद चतुर्वेदी
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