हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने पर तीन दिवसीय आयोजन प्रणाम उदन्त मार्त्तण्डका शुभारंभ, 10 मई तक भारत भवन में देशभर के पत्रकार-संपादक करेंगे विमर्श

भोपाल 08 मई 2026 :पंडित युगलकिशोर शुक्ल जी ने 200 वर्ष पहले एक ही पंक्ति “हिंदुस्तानियों के हित के हेत” लिखकर सदियों के लिए पत्रकारिता का नैरेटिव तय कर दिया था। यह विचार हनुमत निवास, अयोध्या के आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने व्यक्त किया। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि डॉक्टर, इंजीनियर बनाने के संस्थान हैं, लेकिन मनुष्य बनाने के संस्थान कहाँ हैं? यह संस्थान परिवार थे, जिसे हमने कमजोर कर दिया है। हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने के प्रसंग पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय और वीर भारत न्यास की संयुक्त पहल पर आयोजित तीन दिवसीय समारोह ‘प्रणाम उदन्त मार्त्तण्ड’ का आयोजन भारत भवन में किया जा रहा है। इसी कार्यक्रम के अंतर्गत एक विशेष सत्र ‘उत्तिष्ठ भारत’ में आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने अपना पाथेय प्रदान किया और उपस्थित विद्यार्थियों एवं अन्य लोगों की जिज्ञासाओं का समाधान किया।

इस अवसर पर आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण जी ने कहा कि मनुष्य निर्माण की सबसे मजबूत प्रगोगशाला परिवार है। आज यह प्रयोगशाला कुछ शिथिल हुई है। परस्पर विश्वास और संवाद कम हो गया है। यह इसलिए हुआ है क्योंकि हमने अपने लिए कुछ  नहीं सीखा है बल्कि बाजार में बेचने के लिए अपने को तैयार किया है। उन्होंने कहा कि जिन संस्थाओं और व्यवस्थाओं ने हमें तैयार किया है, बाजार ने उनके प्रति अविश्वास का भाव पैदा कर दिया है। इसके लिए तर्क दिया है कि जीवन मूल्यों में यह कमी जेनरेशन गैप के कारण है। जबकि जेनरेशन गैप जैसा कुछ होता नहीं है। अगर ऐसा है भी तो क्या इस गैप को भरने की हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है। आचार्य ने कहा कि एक भ्रांति आई है कि सफलता पाने के लिए सिद्धांतों के मार्ग को छोड़ना पड़ता था। इस भ्रांति से बाहर निकलने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सही-गलत होने से या तर्कों से परिवार नहीं चलता है। संबंध निभाने के भाव से ही परिवार चलते हैं। इसी में मनुष्यत्व का निर्माण होता है।

‘प्रेम क्या है’ इस प्रश्न के उत्तर में आचार्य जी ने कहा कि प्रेम भोग नहीं है। हम जिस प्रेम के लिए अपने माता-पिता से विद्रोह करते हैं, उस संदर्भ में हमें याद करना चाहिए कि वर्षों तक माता-पिता ने बिना किसी अपेक्षा के हमें प्रेम दिया है। यहां तक कि हमारे जन्म से पूर्व से ही माता-पिता हमें प्रेम देते हैं। ऐसे माता-पिता अपने बच्चे के प्रेम में बाधा कैसे बन सकते हैं? दरअसल वे जानते हैं कि आप जिस प्रेम में हैं, वह प्रेम नहीं, भोग है। माता-पिता अपने अनुभव के आधार पर बच्चों का भला-बुरा अच्छे से जानते हैं।  आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने स्पष्ट किया कि राम ने कभी सीता को अपने से अलग नहीं किया। राम और सीता, दोनों एक दूसरे से अलग हो ही नहीं सकते। रामजी के पुरखे एक से अधिक पत्नी रखते थे लेकिन रामजी ने केवल सीता जी को ही अपने जीवन में स्थान दिया। जब उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ किया तब भी सीता जी की प्रतिमा को साथ रखकर आहुतियां दीं। इसके साथ ही रामायण के अन्य प्रसंगों का उल्लेख करके आचार्य ने सिद्ध किया कि राम ने सीता का परित्याग नहीं किया। हमें इस भ्रम से बाहर निकलना चाहिए।

उन्होंने आग्रह किया कि हमें फिल्मों और सीरियल से अपने धर्म को, ग्रंथों को और कहानियों को समझने का प्रयास नहीं करना चाहिए। अपने धर्म को समझने के लिए हमें मूल ग्रंथ पढ़ने चाहिए। युवा को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि युवा होने अर्थ यह नहीं होता कि मूंछें आ गईं। युवा होने का अर्थ है अपनी आग को संभालने की शक्ति आ जाना। अगर युवा में अपनी ऊर्जा को पहचानने का सामर्थ्य आ गया तो वह धरती पर जहां कहीं रहेगा, उजाला ही बेखेरेगा।

इस अवसर पर वरिष्ठ संपादक श्री विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि अक्षर ब्रह्म होता है और उस अक्षर से जो शब्द निर्मित होता है परब्रह्म होता है। जो अक्षर और शब्द की साधना करता है, वे ब्रह्मर्षि और महिर्षि होते हैं। वहीं, वरिष्ठ संपादक श्री राजेन्द्र शर्मा ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने ‘उत्तिष्ठ भारत’ का आह्वान सोए हुए भारत को जगाने के लिए किया। स्वामी विदेश में हिन्दू धर्म का डंका बजाने के लिए गए और कहा कि गर्व से कहो हम हिन्दू हैं। जब वे भारत लौट तो भारत की माटी को अपने माथे से लगाया। उन्होंने कहा कि हिन्दू समाज की कमजोरी के कारण भारत कमजोर हुआ था। हिन्दू सबके कल्याण की बात करता है। उन्होंने कहा कि हम ऐसे मनुष्य बनें जो भारत को आगे लेकर जाएं, मानवीय मूल्यों की रक्षा करें। इस सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार शिफाली पांडेय ने किया।

 
पत्रकारिता जगत का सूर्य है उदन्त मार्त्तण्ड‘ – आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण महाराज

अयोध्या के हनुमत निवास के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेश नंदिनीशरण ने कहा कि दो शताब्दी पहले एक मनीषी ने एक चिंता व्यक्त की उसका प्रतीक है उदन्त मार्त्तण्ड। उनके मन में आया कि हमारे संवाद बाहरी भाषा में क्यों हो, मातृभाषा में क्यों नहीं? अपनी भाषा और उससे बनते संवाद में पंडित युगलकिशोर शुक्ल ने ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ के रूप में पत्रकारिता को पहचाना था।

उन्होंने ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ शीर्षक को स्पष्ट करते हुए बताया कि ‘उदन्त’ यानी समाचार और ‘मार्त्तण्ड’ यानी सूर्य। जैसे सूर्योदय बिना सोए लोग नहीं जागते, वैसे ही यह हिंदी का पहला पत्र समाज को जगाने के लिए ‘अखंड भारत’ के भाव से शुरू हुआ था। उन्होंने कहा कि पत्रकार कोई भविष्यवक्ता या केवल पोस्टमार्टम करने वाला डॉक्टर नहीं है, बल्कि वह समाज का ‘निष्प्रिय और तत्वज्ञ वैद्य’ है, जो समाज की नाड़ी पहचानता है। नैरेटिव की शक्ति पर आचार्य ने कहा कि शुक्ल जी ने पहली ही पंक्ति में “हिंदुस्तानियों के हित के हित” लिखकर सदियों के लिए पत्रकारिता का नैरेटिव तय कर दिया था।

आचार्य जी ने कहा कि पत्रकारिता समाज की सेवा में नियुक्त व्यवस्था है। पत्रकारिता सत्ता या विपक्ष का झंडा उठाने के लिए नहीं है। पत्रकारिता का दायित्व सत्व की रक्षा करना और उसे ही व्यक्त करना है।

एआई और डीप फेक स्वर्ण मृग हैं, इनसे सावधान रहें :

कुलगुरु श्री विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के इस प्रसंग पर हम पंडित युगलकिशोर शुक्ल और हिंदी पत्रकारिता को याद करेंगे। आज की भाषा में जिसे नैरेटिव सेट करना कहते हैं उस दृष्टि से पंडित युगलकिशोर शुक्ल ने आज से 200 वर्ष पहले ही पत्रकारिता का नैरेटिव सेट कर दिया था- “हिंदुस्तानियों के हित के हेत”। यह ध्येय वाक्य बताता है कि समाचारपत्र क्यों प्रकाशित होने चाहिए।

कुलगुरु ने आधुनिक तकनीक और पत्रकारिता के सामने मौजूद खतरों पर गंभीर बात की। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक को ‘स्वर्ण मृग’ (मायावी सोने का हिरण) बताया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि छात्र इस मायावी जाल में फँसे, तो वे त्रेता युग में नहीं हैं जहाँ सुखांत होगा बल्कि कलयुग में है जहां एक गलती से ‘वनवास’ में 14 साल कोर्ट-कचहरी और मानहानि के चक्करों में बीत जाएँगे।

मिशनरी जर्नलिज्म बनाम नेशन फर्स्ट‘ – उदय माहुरकर

भारत सरकार के पूर्व सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने पत्रकारिता के इतिहास और वर्तमान ध्रुवीकरण पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता से पहले पत्रकारिता एक ‘मिशन’ थी। आज के दौर में पत्रकार को लेफ्ट या राइट की विचारधारा से ऊपर उठकर ‘नेशन फर्स्ट’ (राष्ट्र प्रथम) के सिद्धांत पर सत्य को प्रदर्शित करना चाहिए। हमें सोचना चाहिए कि भारत 2037 तक आर्थिक, व्यापारिक और सामरिक रूप से श्रेष्ठ हो जाएगा लेकिन क्या भारत सांस्कृतिक रूप से वहां होगा, जहां उसे होना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को ‘राष्ट्र पहले’ के आधार पर अपनी पत्रकारिता करनी चाहिए।

राम कार्य की दृष्टि से हिंदी की सेवा करें :

लेखक एवं प्राध्यापक डॉ. सी. जयशंकर बाबू ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता की 200 वर्ष की यात्रा में, दक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता के 130 वर्ष की साझेदारी है। हिंदी पत्रकारिता का शुभारंभ गैर-हिंदी भाषी क्षेत्र से हुआ है। इसी प्रकार, भारतीय हिंदी साहित्य का शुभारंभ दक्षिण भारत से हुआ है। इतिहास के पुनर्लेखन में यह बात प्रमुखता से दर्ज होनी चाहिए। तमिल के पत्रकार सुब्रमण्यम भारती ने 1906 में तमिल समाचार पत्र में हिंदी के समाचारों को शामिल किया। दक्षिण में हिंदी की चेतना को देखना है तब आपको 18वीं सदी के केरल के श्रीराम वर्मा का नाम याद रखना होगा। राम कार्य को करने की जो दृष्टि चाहिए, उसी चेतना के साथ दक्षिण भारत में हिंदी की सेवा की जाती है। कहा जाता है कि तमिलनाडु में हिंदी का विरोध है लेकिन कोई यह नहीं बताता कि 1950 के दशक में तमिलनाडु सरकार का हिंदी का समाचार पत्र प्रकाशित होता था। समाचार पत्रों के नाम भी दक्षिणी भाषा और हिंदी के आपसी मेलजोल का संकेत देते हैं। हिंदी वाणी, भारत वाणी और हिंदी मिलाप जैसे समाचार पत्र आज भी प्रकाशित हो रहे हैं।

डिजिटल समय में टीवी पत्रकारिता :

वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण दुबे, बृजेश राजपूत, सलमान रावी, दीप्ति चौरसिया, सुधीर दीक्षित और अनुराग द्वारी ने ‘डिजिटल समय में टीवी पत्रकारिता’ पर अपने विचार साझा किए और विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया। सबने माना कि डिजिटल दौर में टीवी पत्रकारिता के सामने चुनौतियां तो आई हैं लेकिन लोग अभी भी टीवी के प्रति आकर्षित हैं। इस सत्र की संचालन विश्वविद्यालय की पूर्व विद्यार्थी और पत्रकार संयुक्ता बनर्जी ने किया।

पुस्तकों और समाचारपत्रों का लोकार्पण :

•  ‘माखन के लाल’ : पूर्व विद्यार्थियों के अनुभव पर आधारित पुस्तक। इसके संपादक अतिथि शिक्षक विनयश्री नेमा हैं।
* कार्टून कथा : कॉफी टेबल बुक है, जिसमें 9 कार्टूनिस्ट के कार्टून शामिल किए गए हैं।
* प्रणाम उदन्त मार्त्तण्ड : कुलगुरु संपादकीय टीम में शामिल विद्यार्थियों का समाचार पत्र।
* अभ्युदय : नए सत्र के शुभारंभ पर केंद्रित समाचार पत्रिका। अंग्रेजी भाषा में इस पत्रिका का संपादन पत्रकारिता विभाग के बीए-इंग्लिश जर्नलिज्म के विद्यार्थियों ने किया है।
* पहल : ईरान, इजराइल और अमेरिका के युद्ध पर केंद्रित विद्यार्थियों का प्रायोगिक समाचार पत्र। यह समाचारपत्र जनसंचार विभाग के विद्यार्थी प्रकाशित करते हैं।