माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में ‘मन में विराजो राम’ विषय पर व्याख्यान

भोपाल 29 अक्टूबर 2026 :”हम जिस आराध्य को मानते हैं, उनके गुणों को अपने भीतर उतारना ही वास्तव में उन्हें अपने मन में विराजित करना है। एक शिक्षक के भीतर भी श्रीराम के गुण परिलक्षित होने चाहिए।” यह विचार राज्य सूचना आयुक्त एवं प्रख्यात शिक्षाविद श्री उमाशंकर पचौरी ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (एमसीयू) द्वारा शिक्षकों के लिए आयोजित मासिक व्याख्यानमाला में व्यक्त किए।

‘मन में विराजो राम’ विषय पर श्री पचौरी ने गोस्वामी तुलसीदास जी की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि श्रीराम की चार प्रमुख विशेषताएं हैं— नवकंज लोचन, कंज मुख, कर कंज और पद कंजारुणं। यदि शिक्षक अपने मन में राम को विराजित करने का संकल्प ले ले, तो उसकी दृष्टि, वाणी, कर्म और आचरण सब कमलवत निर्मल हो जाते हैं।

दृष्टि निर्लिप्त और वाणी सम्यक हो :
श्री पचौरी ने शिक्षकों की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि शिक्षक की दृष्टि श्रीराम की तरह होनी चाहिए, जो देखती सब कुछ है, लेकिन पूरी तरह निर्लिप्त भाव से। याद रखें, जैसी दृष्टि होगी, वैसी ही सृष्टि होगी। इसके साथ ही शिक्षक की वाणी सदैव सम्यक और संतुलित रहनी चाहिए।”

कर्तापन के भाव से मुक्ति ही ‘रामकाज’ :
दायित्व बोध पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति को ‘कर्तापन’ के अहंकार से मुक्त होना चाहिए। हमें स्वयं को केवल निमित्त मानकर अपने दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए। ईश्वर द्वारा रचित इस सृष्टि को परमात्मा की कृपा से और अधिक समृद्ध बनाना ही सच्चा ‘रामकाज’ है। उन्होंने आगाह किया कि यदि मन कामनाओं और वासनाओं से मुक्त नहीं होगा, तो बाहर चाहे जितनी शुद्धि कर ली जाए, भीतर राम का वास संभव नहीं है।

दीपावली: मन के भीतर दीप जलाने का पावन पर्व :
आगामी पर्व का संदर्भ देते हुए श्री पचौरी ने कहा कि दीपावली केवल बाह्य प्रकाश तक सीमित नहीं है। बाहर दीप जलना जरूरी है, लेकिन अंतरमन में दीप जलना सबसे अधिक आवश्यक है। दीपावली मन के भीतर ज्ञान और सद्भाव का दीप जलाने तथा आनंद व प्रसन्नता व्यक्त करने का पावन अवसर है। व्याख्यान में विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, अधिकारी एवं शिक्षकगण उपस्थित रहे।