“मुबई के डब्बावाला की 136 साल की सक्सेस स्टोरी पर कंपनी के सीईओ से एमसीयू में विशेष संवाद आयोजित”
आन टाइम एवरी टाइम से बनी मुंबई डब्बावाले की ग्लोबल इमेज”
भोपाल 30 सितम्बर 2026 :हमारे लिए कर्म ही पूजा है। हमारा हर ग्राहक हमारे लिए ईश्वर का रूप है। समय और परिस्थिति कैसी भी हो हम हर वक्त अपना काम पूरी निष्ठा से करते हैं। मुंबई में लगभग हमारे 5000 डब्बे वाले लाखों लोगों तक खाना पहुंचाने का सेवा कार्य पिछले 136 सालों से कर रहे हैं। एक सदी से ज्यादा समय हो गया लेकिन हमारा काम बिना किसी छोटी सी गलती के लगातार जारी है। हमारी सेवा से संतुष्ट ग्राहकों की मुस्कुराहटें ही हमारे असली सर्टिफिकेट है। यह बात कही मुंबई डब्बावाले एंटरप्राइस प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक और सीईओ सुनील गवांडे ने। वे एमसीयू के प्रबंधन विभाग द्वारा आयोजित विशेष व्याख्यान में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे।
उन्होंने अपनी बात शुरू करते हुए कहा कि शिक्षा बहुत आवश्यक है। जैसे कोई पंछी बिना पंखों के उड़ नहीं सकता वैसे ही शिक्षा के बिना भी मानव बहुत कुछ नहीं कर सकता। हम अधिकतर डब्बेवाले भी बहुत कम पढ़े लिखे या लगभग अनपढ़ हैं लेकिन हम बिजनेस करना जानते हैं। हम व्यवसाय प्रबंधन जानते हैं यही कारण है कि आज डब्बेवालों की लगभग चैथी पीढ़ी भी इस व्यवसाय में काम कर रही है। उन्होंने बताया कि 136 साल पहले मुंबई में एक पारसी बैंकर ने एक व्यक्ति को अपने आफिस तक उसके घर से भोजन लाने और खाली टिफिन वापस लौटाने के बदले महीने में कुछ निश्चित राशि देकर ऐसा ही काम करवाया। इस बात से प्रेरित होकर मधु हवाजी बाच्चे ने 1890 में 35 डब्बेवालों के साथ एक डब्बावाला सेवा शुरू की। आज मुंबई के 60 से 70 किलोमीटर के दायरे में डब्बावाले अपनी सेवाएं देते हुए 2 लाख ग्राहकों तक टिफिन पहुंचाने का काम करते है।
हर डब्बे वाला साइकिल से चलता है इसलिए कार्बन फुटप्रिंट भी जीरो है। बिजनेस में सांगठनिक दृष्टि से देखें तो अब तक इस संगठन में कभी भी हड़ताल नहीं हुई। श्री गवांडे ने बताया कि आमतौर पर डब्बावालों की एक टीम में 20 से 30 लोग होते हैं। यह टीम ही किसी ग्राहक के घर से भोजन का टिफिन लेने,उसे ग्राहक तक पहुंचाने और फिर खाली टिफिन वापस उसके घर तक पहुंचाने का काम करते हैं। श्री गवांडे ने बताया कि 2003 में प्रिंस चार्ल्स भारत आए और डब्बावालों से मिले। इसके बाद मुंबई के डब्बावाले की कहानी वैश्विक स्तर पर छा गई। डब्बावालों के लिए कुछ कल्याणकारी काम करने की सोच के साथ 2017 में डब्बावाला इंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी बनने की कहानी भी उन्होंने बताई। इस कंपनी में चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर से लेकर के मैनेजिंग डायरेक्टर भी डब्बा वाले ही है। यानी हर डब्बे वाला इस कंपनी में शेयर होल्डर है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं के समय डब्बावाला संगठन देश को आगे बढ़कर सहयोग भी करता है। उनकी भावी योजनाओं में एक ग्लोबल फूड कंपनी शुरू करने की योजना भी है।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलगुरु श्री विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि 2 लाख टिफिन बॉक्स मामूली एरर पर एकदम सही व्यक्ति तक पहुंचाने का काम डब्बेवाले करते हैं। भारतीय लोगों द्वारा चलाए जाने वाले किसी उपक्रम में समय पर और अनुशासित तरीके से काम करने का यह बेहतरीन नमूना है। उन्होंने कहा कि यह प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण पाठ है जो विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगी हो सकता है। श्री तिवारी ने कहा कि एक अच्छी टीमवर्क के साथ डब्बे वालों के काम को हम सभी को जानना चाहिए। समय प्रबंधन इसमें सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि वास्तव में यह मुंबई की जबरदस्त सफलता कहानी है।
डब्बावाला एंटरप्राइस से आए अन्य वक्ता श्री रंजीत ने डब्बावाला की सफलता और प्रबंधन के सूत्रों पर अपनी बात रखते हुए कहा कि हम अपनी सर्विस का दाम बहुत कम रखते हैं। हमारी कंपनी का कोई भारीभरकम कार्पोरेट आफिस नहीं है। हमारी ब्रांडिंग हमारी कड़ी मेहनत, ईमानदारी और त्रुटिरहित सर्विस है। उन्होंने कहा कि हमारी सप्लाई चैन सिस्टम का कोई मुकाबला नहीं है। यही कारण है कि मुंबई के डब्बा वालों पर सिक्स सिग्मा स्टडीज भी हैं हार्वर्ड बिजनेस स्कूल सहित दुनिया के कई प्रबंधन संस्थानों ने डब्बा वालों पर केस स्टडीज की है।
कार्यक्रम का संयोजन प्रबंधन विभाग के प्रमुख डा. अविनाश वाजपेई ने किया। इस अवसर पर सभी विभागों के विद्यार्थी एवं शिक्षकगण उपस्थित थे।










