‘‘बांध दिये ऋतुराज ने ऐसे वंदनवार पीले-पीले हो गये मन के आंगन द्वार’’
‘‘बांध दिये ऋतुराज ने ऐसे वंदनवार
पीले-पीले हो गये मन के आंगन द्वार’’
गीतों और कविताओं की प्रस्तुतियों से सराबोर हुए श्रोता
एमसीयू में ‘काव्य की कक्षा’ का आयोजन
देश के प्रख्यात कवियों ने बसंत पंचमी एवं
निराला जयन्ती के अवसर पर दी काव्यात्मक प्रस्तुतियां
भोपाल 23 जनवरी 2026: वसंत पंचमी पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय का परिसर आज कविता, गीत और दोहों से सराबोर हुआ। अवसर था विश्वविद्यालय द्वारा विद्यार्थियों के लिए आयोजित ‘काव्य की कक्षा’ कार्यक्रम का। इस आयोजन में देश के 5 प्रख्यात कवियों रामायण धर द्विवेदी, सूरज राय ‘सूरज’, डॉ. सुरेश, राजेश शर्मा एवं मासूम गाजियाबादी ने विद्यार्थियों के सामने गीतों, कविताओं एवं दोहों की अद्भुत प्रस्तुतियां दी। इस आयोजन के साथ आज निराला जयंती पर सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को याद करते हुए वरिष्ठ पत्रकार विनय
उपाध्याय ने निराला के काव्य पर केन्द्रित ‘निराला के शब्दराग’ विषयक प्रस्तुति भी दी।
काव्य की कक्षा का प्रारम्भ करते हुए प्रख्यात कवि सूरज राय ‘सूरज’ ने अपनी कविता सुनाते हुए कहा-
‘‘करो कुछ यूं कि हर मुश्किल की आसानी निकल आए,
तुम्हारी बावजह पैदाइश का मानी निकल आए,
किसी को भी रूलाने का तरीका मैं बताता हूं,
हंसाओ यूं कि उसकी आंख से पानी निकल आए।’’
मानवीय संबंधों की परतों की पड़ताल करती इन पंक्तियों को सुनते ही श्रोताओं की तालियों की गड़गड़ाहट से एमसीयू का गणेश शंकर विद्यार्थी सभागार गूंज उठा। उन्होंने फुटपाथ की ठंड और मानवीय मूल्यों पर केंद्रित कविता के साथ ‘तल्खी मन की नर्मी में घुल सकती थी’, ‘जीने की जिद में मौत से क्या-क्या निभाएं’, ‘जिक्र से भरे मेरे अखबार पैदा हो गए’ आदि कविताओं का पाठ भी किया।
ग्वालियर से पधारे श्री राजेश शर्मा ने घनाक्षरी से अपना काव्यपाठ आरंभ किया। महानगरों में बसंत की स्थिति पर उन्होंने ‘तू प्यासा मैं मरूधरा’, ‘किरणों ने छू भर दिया ओस लाली को गाल’, ‘तेरे मेरे बीच ऐसी है दीवार’ आदि रचनाएं सुनाईं। लखनऊ से आमंत्रित डॉ सुरेश ने कहा कि कवि और पत्रकारों का काम समाज के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने युवाओं के लिए विशेष तौर पर रचित गीत, ‘‘एक वसंत लिए जीता हूं, ‘पतझड़ का करके श्रृंगार, वैसे तो दिल दुख का दरिया, मैं पानी का पहरेदार सुनाया‘‘। इसके बाद निराला जी को याद करते हुए उन्होंने एक अन्य गीत, बाहर बेला बनकर महके, भीतर टेसू के वन दहके, ऐसा ही जीवन होता है, पगले मन तू क्यों रोता है‘‘ सुनाया। डॉ. सुरेश ने इस अवसर पर अपनी एक अन्य रचना, इस नगर हैं, उस नगर हैं, पांव में बांधे सफर हैं, हैं थके हारे, नींद के मारे, हम तो ठहरे यार बंजारे‘‘ भी सुनाई।
इस अवसर पर युवापीढ़ी के सिद्ध कवि और लेखक श्री रामायण धर द्विवेदी ने जुगनू जैसी जलती बुझती, छोटी-छोटी आशाएं, जीने का कारण बन जातीं छोटी-छोटी आशाएं‘‘ वाला उम्मीदों और आशाओं का गीत सुनाया। कार्यक्रम का संयोजन करते हुए रामायण धर द्विवेदी ने विद्यार्थियों के बीच देश के प्रख्यात कवियों की रचनाओं को समाहित करते हुए श्रोताओं का मन मोह लिया।
इस कार्यक्रम की अध्यक्षता मासूम ‘गाजियाबादी’ के नाम से मशहूर प्रख्यात कवि श्री नरेन्द्र सिंह ने की। उन्होंने मानवीय मूल्यों, संबंधों और गरीबी, आदि विषयों पर अपनी कई महत्वपूर्ण रचनाएं प्रस्तुत की। मानवीय स्वाभिमान पर चंद पंक्तियां सुनाते हुए श्री गाजियाबादी ने कहा कि-
‘‘यूं भी बचाई हमने गरीबी की आबरू, नंगे भी हम रहे तो अदब से तमीज से,
भूखे हुए तो पेट को घुटनों से ढक लिया, सर्दी लगी तो ढक दिए घुटने कमीज से।’’
चकाचौंध भरे समाज में अक्सर शादियों आदि अवसरों पर बारात में रोशनियों को ढोते बच्चों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि-
‘‘खुशी से झूमती बारात को छोड़ो उन्हें देखो, कि जिनको नाच गाने का बहाना तक नहीं मिलता
जो बारातों में अक्सर रोशनी का बोझ ढोते हैं, उन्ही बच्चों को बारातों में अक्सर खाना तक नहीं मिलता।’’
इस अवसर पर श्री गाजियाबादी ने मौजूदा समय पर प्रासंगिक एक गीत मांग मंचों की हम पूरी करते रहे, दूर मंचों से कविता सिसकती रही, भी प्रस्तुत किया।
विश्वविद्यालय के कुलगुरू विजयमनोहर तिवारी ने कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए कहा कि एक गंभीर बात जो सैकड़ों शब्दों के संपादकीय या खबरों में नहीं कही जा सकती, उसे कवि अपनी लेखनी से 10 से 12 शब्दों में सृजनात्मक ढंग से अभिव्यक्त कर देते हैं। उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जयंती तथा बसंत पंचमी जैसे सुअवसर पर एमसीयू के परिसर में काव्य की कक्षा को अत्यधिक प्रासंगिक बताया। उन्होंने कहा कि आज का दिन सरस्वती कंठभरणों को याद करने का भी दिन है।
इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार विनय उपाध्याय ने महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के काव्य पर केंद्रित, निराला के शब्द राग की प्रस्तुति में कहा कि भारत की महान परंपरा में शब्द और नाद के योग से कविता जन्मी है। निराला ने पाया कि शब्द की असली शक्ति उसमें छिपे अंतरनाद में होती है। वे रवींद्र संगीत और लोकसंगीत को सुनते थे और उससे प्रभावित थे। श्री उपाध्याय ने कहा कि निराला अपनी कविताओं में स्वतंत्रता का उद्घोष भी करते हैं। अपनी कविताओं में निराला प्रयोगधर्मी थे और उन्होंने कई छंदों को तोड़ते हुए नए छंदों को भी रचा।
निराला भारत की आत्मा के कवि थे।
कार्यक्रम का संचालन श्री रामायण धर द्विवेदी एवं विश्वविद्यालय के पुस्तकालय अध्यक्ष डॉ. आरती सारंग ने किया। कार्यक्रम के अंत में आमंत्रित अतिथियों का आभार प्रदर्शन विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ. पी. शशिकला ने किया। कार्यक्रम में सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री अशोक पाण्डेय, समाजसेवी श्री कैलाशचन्द्र, दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक श्री मुकेश मिश्रा सहित विश्वविद्यालय के विद्यार्थी, प्राध्यापकगण, अधिकारी तथा नगर के गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।








